नए संदेश
Saturday
महाराष्ट्र जैसी घटनाएं और मारवाड़ी
मुझे लगता है चर्चा ज्यादा ही संगठन केंद्रित हो रही है। क्या यह अच्छा नहीं होगा कि हम ऐसे मुद्दों पर भी लिखें जो व्यापक मारवाड़ी समाज से सरोकार रखते हों। मसलन, यह बात मैं सोचता रहता हूं कि यदि कल को मुंबई में मारवाड़ी समाज के साथ वैसा ही सुलूक होने लगे जैसा आज बिहार और यूपी वालों के साथ हो रहा है, तो क्या आवाज उठाने वाला और प्रधानमंत्री को कार्रवाई करने के लिए मजबूर करने वाले नेता हमारे पास हैं। तब क्या हम राजस्थान के मुख्यमंत्री के मुंह की ओर ताकते नहीं रह और नतीजे में निराश होते नहीं रह जाएंगे? क्या हमें समज रहते सोचना और अपनी आज तक की मेहनत को सही रास्ते पर नहीं लगाना चाहिए? क्या एक राजनीतिक ताकत हासिल नहीं करनी चाहिए? जो ताकत है उसे एकजुट करना नहीं चाहिए?
विनोद रिंगानिया
Monday
आवश्यकता है अन्तरावलोकन की
अब हम आते हैं बिनोद जी द्वारा सुझाये गए एक नयी संस्था के गठन पर। बिनोद जी ने अपने लेख में पुराने और अनुभवी (पोषक) सदस्यों हेतु एक अलग संस्था के गठन की बात कही है। उक्त नयी संस्थाओं के मध्यम से पोषक सदस्यों की उर्जा और अनुभव तो उपयोग आ जायेगी, पर मंच को उससे क्या फायदा होगा? यह स्पष्ट नहीं हो रहा है।
बिचार कर सकते हैं की क्या मेरे द्वारा सुझाये गए थिंक टेंक की आवश्यकता है? क्या थिंक टेंक और नयी संस्था की आवश्यकता की पूर्ति किसी एक कदम से हो सकती है? यदि आप चाहें तो थिंक टेंक से अपेक्षाए और उसके कार्यो पर मैं अपने बिचार बिस्तृत रूप से रखना चाहूँगा।
आज इतना ही
अजातशत्रु
Saturday
बड़ों के लिए संस्थागत (institutionalised) व्यवस्था करनी होगी
मंच में इससे बुरी स्थिति
मंच में इससे भी बुरी स्थिति है। इसमें एक उम्र के बाद उसके लिए कोई स्थान नहीं है। मुख्यालय में भी नहीं। इस उम्र के बाद उसे मात्र सम्मान समारोहों में बुलाया जाता है सम्मान उनके हाथ से दिलाने के लिए।
दरअसल जिस समय युवा मंच बना, उस समय सम्मेलन तो काम कर ही रहा था, तो यह बात दिमाग में नहीं आई कि हम रिटायर होने के बाद क्या करेंगे। 1995-2000 तक यह बाद दिमाग में आ जानी चाहिए थी लेकिन नहीं आई। नतीजा यह है कि युवा मंच का तपा-तपाया अनुभवी नेतृत्व आज, मुहावरे की भाषा में कहें तो, कूड़ेदान में पड़ा है।
नेतृत्व ही असली ताकत
किसी संगठन में व्यक्ति की ताकत से इनकार कोई नहीं कर सकता। जब सोनिया गांधी नहीं थी तब कांग्रेस की क्या गति हुई। कल को लालकृष्ण आडवाणी नेतृत्व में नहीं रहेंगे तो भाजपा की क्या गत बनेगी सहज ही कल्पना की जा सकती है। यह बात अलग है कि हो सकता है, उनसे भी बेहतर नेतृत्व निकलकर आ जाए। लेकिन नहीं आया तब तो हालत बदतर होगी न।
इसलिए आज सबसे बड़ी जरूरत यह महसूस हो रही है कि हमें अपने तपे-तपाए नेतृत्व से आगे हाथ नहीं धोना पड़े, साथ ही आज जो कार्यकर्ता रिटायर जिंदगी गुजार रहे हैं उनकी क्षमताओं का इस्तेमाल करने की कोई व्यवस्था हो।
मंच बंधु कतई नहीं
कोई कह सकता है कि मंच बंधु के द्वारा इसी की व्यवस्था की गई थी। लेकिन मुझे लगता है ऐसा नहीं है। मंच बंधु को यदि सचमुच संवैधानिक ताकत दी गई होती तो आज यह स्थिति आती ही नहीं।
मुझे लगता है कि आज ऐसे सहायक संगठन की जरूरत है जिसमें बड़ी उम्र वालों के लिए स्थान हो। मंच में जो लोग 35-40 के हो चुके हैं उन्हें मंच में रहते हुए ऐसे संगठन की स्थापना करनी चाहिए। उन्हें मंच में कम और इस संगठन में ज्यादा समय देना चाहिए। साथ ही इसमें मंच से रिटायरमेंट ले चुके असंगठित हो चुके लोगों की क्षमताओं का इस्तेमाल करने की भी व्यवस्था हो।
नया संगठन क्या करेगा
मंच के सहायक नए संगठन की रूपरेखा तो सभी को मिलबैठकर तय करनी होगी, लेकिन मेरे दिमाग में जो छवि आ रही है वह है ऐसे संगठन की जिसका कार्यक्षेत्र ज्यादा व्यापक होगा। जिसके बैनर तले हर राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक मुद्दों पर खुली चर्चा होती रहेगी और हम देश के सार्वजनिक जीवन में मारवाड़ी समाज के लिए एक ज्यादा प्रभावी स्पेस तैयार कर पाएंगे।
किशोर मंच भी
इसी के साथ बिल्कुल कम उम्र वालों के लिए भी किशोर मंच या ऐसा ही कोई मोर्चा होना चाहिए। मंच के 25-30 की उम्र वाले नेतृत्व के सामने 15-20 की उम्र वालों में से किसी प्रतिभा का निकलकर आना मुश्किल लगता है।
बड़ों के लिए संगठन बनने पर मंच में औसत आयु जो बढ़ती जा रही है उसका समाधान भी अपने आप हो जाएगा। नया संगठन जिस दिशा में काम करेगा, युवाओं को उससे अपने आप यह आभास हो जाएगा कि किस दिशा में जाना है।
आपका
विनोद रिंगानिया
गुवाहाटी

मंच की दिशा और दशा पर चर्चा चल ही रही है। आप सभी से अनुरोध है कि कृपया इस चर्चा में भ्हाग लें और औरो को भी भाग लेने के लिए प्रेरित करें। दीपावली का पावन त्यौहार सामने है। इस त्यौहार के बारे में सोचते ही झिलिमिलाती रौशनी और पकवान कि खुशबू का मादक अहसास मन को प्रफुल्लित कर देता हैं। पर जब बारूद कि गंध और पटाखो की कानफोडू आवाज का ध्यान आता है तो यह मादक अहसास डरावने अहसास में परिवर्तित हो जाता है। सीमित आतिशबाजी तो ठीक है पर जिस तरह से आतिशबाजी के नाम पर पर्यावरण को प्रदूषित किया जाता है, उसके बिरुद्ध मंच जैसी सामाजिक संस्थाओ को आवाज उठानी ही चाहिए। कम से कम हम अपने सदस्यों से तो इस मामले में एक अपील कर ही सकते हैं। कुरीतियों के परिमार्जन का जो बीड़ा मंच ने कभी उठा रखा था, समय का तकाजा है कि मंच उस बारे में पुनः सोचे और कार्य करें। आइये हम सब कम से कम अपने अपने परिवार को इस दीपावली पर पटाखों के प्रयोग न करने हेतु तैयार करें।
अजातशत्रु








