चाहे बात असम की हो या कलकाता की हो, या फिर बिहार, उड़ीसा या असम की हो, मारवाड़ी समाज के ऊपर यह इल्जाम लगता रहा है की वह पैसा का प्रदर्शन कुछ ज्यादा ही करता है। चाहे बात निमंत्रण पत्र की हो, या फिर पंडाल की साजो-सज्जा की हो, हर तरफ़ ही वैभव प्रदर्शन जो की इतर समाज में एक ग़लत मेसेज देती है, साथ ही समाज को जलील होना पड़ता है। शम्भूजी की पीड़ा जायज है, पर हम भी उसी समाज का एक अंग है। मैं उनको युवा मंच के एक कार्यक्रम की और ले जाना चाहता हूँ जब गुवाहाटी में सगाई के अवसर पर लड्डू का वितरण बिल्कुल बंद करवा दिया गया था, जिससे फिजूल खर्ची बचे, विश्वास मानिये, मध्यम श्रेणी में यह कार्यक्रम बहुत पोपुलर हो गया था। बाद में कुछ कारणों से मंच को यह कार्यक्रम वापस लेना पड़ा था, यह बात है १९९२ की है । पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अनिल जैना जी के नेतृत्व में यह प्रोजेक्ट शुरु हुआ था। शायद हमें कुछ ऐसा ही प्रोजेक्ट आज लेना होगा, जिससे समाज के पास एक संदेश जाए। भय बिना प्रीत नही है, वाली कहावत कितनी चरितार्थ होती हमारे समाज पर। जब तक हमारे युवा गुवाहाटी में शादी विवाहों में जाते थे, वहाँ एक माहोल बन जाता था की,"युवा मंच का लड़का आ गया, और अब अगर आपा वैभव प्रदर्शन करंगा तो वेह लोग शादी में विघन डालेगा" गीत सम्मलेन, रास्ते पर नांच गाना वैगेरह सभी चीजों पर पाबन्दी थी। ऐसा भी नहीं है की एक बार दुबारा शुरुवात नहीं हो सकती।
मैं अपनी बात दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों के साथ समाप्त करना चाहुंगा कि:
"कौन कहता है कि आसमान में सुराख़ नही हो सकता,
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।"
Ravi Ajitsariya,
54A H B Road, Fancy bazar,
Guwahati-781 001











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