इस ब्लॉग को प्रारम्भ करने का उद्देश्य: मंच की दशा और दिशा पर चर्चा करना। यह संवाद यात्रा AIMYM द्वारा अधिकृत नहीं है। संपर्क-सूत्र manchkibaat@gmail.com::"

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Sunday

बाढ़ राहत अभियान से दो संस्मरण


अरे- अरे ये क्या कर रहे हो? उतरो, पीछे हटो- पीछे हटो. सबको पीछे करो. बोट जोरों से हिल रही थी. एक बार तो हम सब घबरा गए कि कहीं बोट उलट ना जाए फ़िर रिलीफ पैकेटों को नीचे रखकर, अब हम उन सबों को पीछे करने लगे जो कमर तक के पानी में रिलीफ पैकेट लेने के लिए बोट को घेर कर खड़े थे. खैर जल्द ही... (आगे पढने के लिए यहाँ क्लिक करें)
- अनिल वर्मा

Wednesday

मारवाड़ी युवा मंच का बाढ़ राहत अभियान - एक संस्मरण

हम बारह जने थे, चार-चार लोग तीन बोट पर सवार हुए साथ ही चार आर्मी के जवान भी बैठे हर एक बोट पर. रिलीफ मेटेरियल हमने लोड कर लिया था. साथ में ढेर सारी पानी की बोतलें और हाँ हर एक के लिए एक छाता भी. धुप तो चमड़ी जला रही थी इन दिनों. वाह री कुदरत तेरा भी गजब खेल है नीचे तो चारो तरफ़ पानी ही पानी और ऊपर से आग बरस रही है. मोटर बोट स्टार्ट हुई और हम बढ़ चले अपनी मंजिल की ओर - छातापुर ब्लाक. त्रिवेणीगंज (जिला- सुपौल) से १० कि.मी. दूर एक घाट से रवाना हुए है और दो-ढाई घंटे लगेंगे छातापुर पहुचने में. आधे घंटे बाद ही वो नजारा शुरू हो गया जिसे देखने और कवर करने भाई सर्वेश शर्मा आए थे - सीकर (राजस्थान) से. श्री सर्वेश शर्मा, दैनिक भास्कर के उप-सम्पादक हैं.उनका कैमरा कवर करने लगा - टापू में बदल चुकी बस्तियों को, अपने खेतों में तैर रहे किसानो और उनके परिवार वालो को.
अचानक एक झटका लगा, बोट रुक गयी, ये क्या हुआ? दरअसल खेतो की मेड में मोटर का फैन फंस गया था. आर्मी वालों ने पास आ चुके ग्रामीणों से कहा - धक्का लगाओ - २ तो पैकेट दूंगा. आखिर बोट वहां से निकली, कुछ पैकेट उन किसानो को मिले, फ़िर शुरू हुआ आगे का सफर. हरिहरपट्टी पंचायत पहुँचते-२ डेढ़ घंटे लग गए.
बोट कि आवाज सुनकर ही इकठ्ठा हो चुके ग्रामीण हमारा इन्तेजार कर रहे थे. हर एक को एक-२ पैकेट दिया जा रहा था. लोग ज्यादा थे पैकेट कम इसलिए प्राथमिकता महिलाओ को दी जा रही थी.
लगभग सभी को पैकेट दिए गए. कुछ पैकेट हमने रिजर्व में रखे ताकि लौटते समय कोई अत्यन्त जरूरतमंद मिले तो उसे दे.

और एक जगह एक पूरा समूह मिला भी ऐसा - महिलाएं ही ज्यादा थी, पुरूष तो किनारे तक चले गए. महिलाएं बच्चो, वृद्धो और जानवरों के साथ गाँवों में ही थीं. आँचल फैलाकर, कमर तक पानी में डूबी इन महिलाओ को रिलीफ पैकेट देकर मन में संतुष्टि तो शायद ना ही होती - पीड़ा अधिक थी. लेकिन कई दिनों से इस मंजर के आदी होने के बाद अब प्रकृति की क्रूरता ने हमारे दिलों को भी कठोर बना दिया था. बोट पर सारे पैकेट ख़त्म हो चुके थे, लेकिन एक बूढी महिला गिडगिडा रही थी, उसके हिस्से कुछ भी नही आया था. ब्रजराजनगर (उडीसा) से आए भाई रमेश जी ने यह देख अपना पर्स निकाला लेकिन अफ़सोस करते हुए वापस अपनी जेब में रख लिया. सच है अगर पैसे दे भी तो खरीदने के लिए भोजन है कहाँ कोसी के इस महासमुद्र में.
रिलीफ पैकेट ख़त्म होने से बोट में जगह बन गयी थी अतः हमने कुछ ग्रामीणों को बोट पर चढ़ा लिया, किनारे पहुंचाने के लिए. उनमे से एक शिकायत कर रहा था - सर आप लोग ज्यादातर औरतों को ही पैकेट क्यो देते है? आनंद भइया ने कहा - औरत भूखे रहकर भी बच्चों को खिला देगी. लेकिन ग्रामीण असहमत था - नही सर, हमारे गाँव की औरतें बहुत दुष्ट है वो ख़ुद खायेंगी, हमें नही देंगी. बाकी ग्रामीणों की हंसी के ठहाकें उठे. लेकिन हमारे चेहरे भावशून्य सामने किनारे को देख रहे थे. अब राहत शिविर में लौटना है .

- अनिल वर्मा

बाढ़ राहत अभियान से पुनर्वास कार्यक्रम तक - ३ महीनो का सफर

प्रलय.. विनाश.. तबाही.. लोगो की चीख पुकार.. डूबते लोग.. तैरती लाशें.. और अंत में गहरा सन्नाटा.. जिसे रह-रह कर सुख चुके आंसुओ के साथ अभागों का क्रंदन ही तोड़ता था. एक युग की तरह समाप्त हुए इस दौर में एक-एक पल बरसो की तरह प्रतीत होते थे.
आज उस त्रासदी को घटित हुए ३ महीने पूरे हुए जिसकी गूँज विधवाओ के विलाप और बच्चो की सिस्कारियों के रूप में आज भी प्रतिध्वनित होती है.
काफ़ी कुछ देखा जाना और महसूस किया पिछले ३ महीनो में. लोगो को... जो बेबस और लाचार थे, और उनको भी जो इनकी बेबसी को अपनी खुशनसीबी मान रहे थे. कुछ ऐसे थे जो इनकी सेवा करते हुए न्योछावर हो रहे थे .. धन्य मान रहे थे की कुछ काम तो आ सके .. उसके बाद भी अफ़सोस की ओह कुछ भी तो न कर सके .. काश और कर पाते.
और हाँ ऐसे लोगो को भी देखा जिन्हें ये अफ़सोस था की अरे इस सारी कवायद से हमें कितना फायदा हुआ.. इन्हे अफ़सोस था की उन अभागों के आंसू पोंछने में उनका नाम क्यो नही हुआ.. ये और चाहे कुछ ना करते, एक रुमाल तो दे ही सकते थे और ढोल पीट सकते थे.. मीडिया और समाज में की देखो ये जो आंसुओ से भींगा हुआ रुमाल है ये हमने अर्रेंज करवाया था.. इसको निचोडो.. अरे देखो-देखो कितने आंसू है. इनको पोंछने का क्रेडिट हमें जाता है.. हर आंसू का हिसाब वसूलना है. आओ एक फोटो हो जाए इस रुमाल के साथ.. क्लिक . लो जी हो गयी समाज सेवा.
आप पूछेंगे.. बहुत नाराज हो भाई.. हाँ हूँ.. भड़ास निकाली है. इस ब्लॉग में ये सब क्यो लिखा? क्योकि यहाँ लिखना जरुरी था. किंतु क्षमा करें इसका उत्तर या इस बारे में किसी भी प्रश्न का कोई जवाब मुझसे कभी नही मिलेगा. मन हल्का हुआ आइये अब कुछ और भी बातें करें.
बाढ़ राहत अभियान को हम उन बातों के लिए नही याद रखेंगे जो ऊपर लिखी है क्योकि इस बारे में ज्यादा लोग नही जानते. ये लडाई तो मानसिक रूप से लड़ी जा रही थी.
धरातल पर तो शौर्य की गाथाएं लिखी गयीं. यहाँ पराक्रम दिखाने को हल्दीघाटी का मैदान तो नही था लेकिन कोसी के कोप में डूबा एक बड़ा भू-भाग था जिसने तबाही के मंजर पर हौंसलों की इबारतों को खडा होते देखा. नमन है साथियों आप भीष्म है और आप ही कृष्ण भी.
आज के दौर में जब लोग अस्पताल के सामने बेहोश पड़े आदमी को भी अन्दर नही ले जाना चाहते क्योकि उन्हें ऑफिस में देर हो जायेगी.. या यह उनकी जवाबदेही नही है.
ऐसे में, आप सबो ने सेवा की ऐसी मिसाल पेश की है जिसके बारे में लोग बरसों तक चर्चे करेंगे. .. कम से कम वो तो करेंगे ही.. जिन बेबसों के लिए आपने अपने व्यापार, व्यवसाय और परिवार का त्याग किया. नेताओ, मीडिया और ...... का सर्टिफिकेट चाहिए किसे?
बेमिसाल ... शाबास .. शाबास.
अब आगे क्या?
हूँ.. .... करने को तो काफ़ी कुछ है. पुनर्वास प्रोजेक्ट हम सबों ने फाईनल किया था ... करेंगे भी .. प्रांत के पास अर्थाभाव है. लेकिन ये तो पहले भी था तब भी तो काम हुआ ही. हमें भरोसा है हमारी लीडर पर.. जब यहाँ तक पहुंचे है तो इस मंजिल को भी पा लेंगे. हमारी लीडर के बारे में बड़ी बात ये है की उनका ह्रदय माँ की तरह कोमल हो लेकिन उनके इरादे फौलाद की तरह मजबूत होते है. .. और जरुर करेंगे भाई.. समाज के लिए करना है.. समाज जरुर सहयोग करेगा.
जगदीश जी, जिन्हें हम प्यार से पप्पू भइया कहते है उनकी चाचीजी का स्वर्गवास हो गया. इस वजह से यह प्रोजेक्ट दस-बारह दिनों के लिए विलंबित हो गया है अन्यथा छठ पर्व के बाद हम जोर-शोर से इस प्रोजेक्ट में लगने ही वाले थे. पप्पू भइया एक-दो दिनों में फ्री हो जायेंगे और पुनः पूरी टीम निकल पड़ेगी उसी सफर पर जिसकी शुरुआत तो हमें पता होती है, किंतु अंत नही. गजब अहसास है... सोचकर ही .. शरीर ऊर्जा से भर उठता है.
रह-रह कर फंड की चिंता होती है किंतु भरोसा है .. पप्पू भइया है न .. सरिता भाभी - आनंद भइया है ना .. वो लोग देख लेंगे. पहले भी इन लोगो ने सब कुछ संभाला था. आगे भी इन पर ही सारी जिम्मेदारी है.
और अंत में धन्यवाद ... आज के कर्ण और भामाशाहों का जिन्होंने मानवता की सेवा में अपना खजाना खोल दिया अन्यथा ये सब कुछ हम सबों के बस का था क्या?

- अनिल वर्मा
मारवाडी युवा मंच, बिहार का एक कार्यकर्ता